Friday, July 25, 2014

समाजवाद क्या है

समाजवाद का मूल सिद्धांत है देश की कमाई को नए ढंग से बांटना. आपने शायद लक्ष्य नहीं किया हो, पर यह सत्य है कि देश की आय प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण बंटती रहती है और उस आय का बंटवारा होता ही रहेगा. जब तक देश में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद रहेंगे, तब तक अहर्निश यह बंटवारा होता ही रहेगा. प्रश्न हमारे सामने यह नहीं है कि बंटवारा होना चाहिए या नहीं, बंटवारा तो होगा ही, पर सोचना यह है कि किसको किन शर्तों पर कितना मिले? पाश्चात्य विद्वान महर्षि पाल ने एक बार कहा था-जो काम नहीं करेगा, उसे खाने को नहीं मिलेगा. वे शायद अदूरदर्शी थे. वे भूल गए कि संसार में बच्चे भी तो हैं. बच्चे काम नहीं कर सकते और भूख सबसे ज़्यादा उन्हीं को सताती है. अगर उन्हें समय पर खाने को मिले तो शायद विश्व में कोई भी जीवित नहीं बचेगा. इसलिए यह नियम कि जो काम करे वही खाना खाए, चल नहीं सकता.
कई व्यक्ति, जिन्होंने कभी इस प्रश्न को गहराई से सोचा ही नहीं है, कह देते हैं कि जिनके पास जितने रुपये हैं, उनको उतनी ही रोटियां या कपड़े ख़रीद कर ख़र्च करने का अधिकार होना चाहिए. पर वे भूल जाते हैं कि आख़िर रुपया-सोना-चांदी या जेवर तो खाने-पीने की चीजें हैं नहीं. रुपया जीवनोपयोगी चीजें ख़रीदने के काम आता है.
कई लोग समझते हैं कि जिस तरह वे बचत कर सकते हैं, उसी तरह विश्व के धन का संचय या संग्रह करके रखा जा सकता है. यह भारी भूल की बात है. बहुत सा धन जो हम सबको जीवित रखता है, सप्ताह से ज़्यादा टिक नहीं सकता, नष्ट हो जाता है. सोने का कंगन उम्र भर क़ायम रह सकता है, पर कंगन खाकर तो जीवित नहीं रह सकते. दाल-रोटी, शाक-सब्ज़ी, दूध-दही या किसी प्रकार के निरामिष या सामिष भोजन आप कितने ही प्रयास क्यों करें, सप्ताह से ज़्यादा टिक ही नहीं सकते. एक सप्ताह इसलिए कि वर्तमान वैज्ञानिक उपकरणों से फ्रिज में, थरमस में ब़र्फ से आवृत्त रखकर कई उपायों से उसे ताज़ा रखा जा सकता है. नहीं तो दो-तीन दिन में ही सब प्रकार के भोजन नष्ट हो जाते हैं. इसके बाद जो बासी खाएंगे तो आपको हमको बीमारी होगी, पेट में ज़हर हो जाएगा और जीवन का खतरा भी पैदा हो जाएगा. कपड़े जो आप और हम पहनते हैं, वे भी ज़्यादा समय तक टिक नहीं सकते. अगर कामकाजी व्यक्ति हैं तो कपड़े बहुत जल्दी फट जाते हैं. मैले तो खैर पसीने गर्द इत्यादि से हर रोज़ होते ही हैं, धुलवाने और सा़फ-स़फाई का ख्याल रखना ही होता है. लिहाज़ा कपड़ों की भी यही हालत है. जूतों में चाहे आप रबर के सोल लगवा लीजिए. छह महीने में टूटने वाले होंगे तो बारह महीने चल जाएंगे, पर वे भी नष्ट होंगे ही. हर साल नई फसल पैदा होती है. पिछले साल जो फसल हुई थी, उस पर आप और हम जीवित नहीं रह सकते. आने वाले वर्ष की फसल अभी तैयार नहीं हुई है. अत: हम सबको इसी साल की पैदावार पर जीवित रहना है, इसी को बोना-काटना या लादना है, इसी का आटा गूंधकर रोटियां बनानी हैं. इसी साल या समय के कपड़े सिलवाने या धुलवाने हैं. इस समय के लिए चम़डे के जूते बनवाने हैं. अन्यथा भूख, ठंड या गर्मी से बचाव होने की वजह से मर जाएंगे, जीवित नहीं रह सकेंगे.
जिसको बचत कहा जाता है, वह सही अर्थ में भविष्य के लिए किया जाने वाला सौदा मात्र है. उदाहरणस्वरूप मान लीजिए, मैंने आज 101 रोटियां बनाईं. मैं स्वयं तो स़िर्फ एक ही खा सकूंगा, बाक़ी 100 मैं बचाकर सुरक्षित रख नहीं सकता, क्योंकि उनका नष्ट होना अवश्यंभावी है. एक सप्ताह के बाद वे खाने लायक़ रहेंगी ही नहीं. इसलिए मैं स़िर्फ सौदा ही कर सकता हूं. उस व्यक्ति के साथ, जिसे 100 रोटियों की आवश्यकता है. अगर मैं अपनी 100 रोटियां किसी को दे दूं और बदले में मान लो वह मुझे पांच नई रोटियां हर वर्ष भविष्य में देता रहे तो यह सौदा हुआ. यह बचत नहीं हुई. दो पक्षों के बीच एक सौदा हुआ, एक समझौता हुआ. एक पक्ष जो भविष्य के लिए अपनी व्यवस्था निश्चित करना चाहता है और दूसरा पक्ष जो वर्तमान में ज़्यादा ख़र्च करना चाहता है. इन दो पक्षों में आपसी सौदा हुआ. नतीजा यह हुआ कि मैं तब तक कुछ नहीं बचा सकता, जब तक कि दूसरा उस व़क्त ख़र्च करने वाला मुझे मिल जाए. इसलिए यह धारणा कि सारा देश बचत कर सकता है, असंभव है. सत्य यही है कि कुछ भाग्यशाली व्यक्ति, जिनके पास उनकी ज़रूरत से ज़्यादा है, अपने भविष्य का कुछ बंदोबस्त कर सकते हैं, पर वह तभी संभव है, जब ऐसे व्यक्ति उन्हें मिल जाएं, जिनकी खपत निज की संपत्ति से अधिक है. तात्पर्य निकला कि राम जो बचाए, उसे हरी को ख़र्च करना चाहिए, नहीं तो राम की बचत व्यर्थ जाएगी, नष्ट होगी.
सारे राष्ट्र को अपनी-अपनी रोटी बनानी है और जीवित रहना है. अगर राष्ट्र काम करना बंद कर दे, निष्क्रिय हो जाए और उसके निवासियों के पास अपनी-अपनी निज की संपत्ति में ज़मीन, जायदाद, मकान हों और लाखों रुपये बैंक में जमा हों तो भी 15 दिन में सारा का सारा राष्ट्र मृत्यु के मुख में चला जाएगा. आप किसी धनिक से मिलें, जो सिर धुनकर कहता है कि अमुक निर्धन या ग़रीब व्यक्ति ने बचाकर नहीं रखा और अफसोस करता हो या उपदेश देता हो तो आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि ऐसे व्यक्तियों को सद्बुद्धि दें. वे अज्ञान में हैं, नहीं जानते बचत हो नहीं सकती. राष्ट्र को निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए. उसकी अनर्गल बातों या उपदेशों को ग्रहण करके किसी निर्धन व्यक्ति को यह सब सुनाकर उसे व्यथित मत कीजिए.
इस तरह से यह दैनिक क्रम चलता ही रहता है. हर व्यक्ति को रोज रोटी बनानी पड़ती है. प्रश्न स़िर्फ यही है कि किसको कितनी रोटी मिलनी चाहिए. मान लीजिए, एक ग़रीब व्यक्ति दिन भर मेहनत-मज़दूरी, परिश्रम करता है, उसके 4-6 बच्चे हैं. उसे कुल मिलाकर 8 रोटियां रोजाना चाहिए और उसके पास हैं केवल दो ही रोटियां. इसके विपरीत एक दूसरे व्यक्ति के पास रोजाना 20-25 रोटियां फालतू हैं. वह अकेला महंत है, कामकाज भी करने की ज़रूरत नहीं. फिर भी उसके पास दैनिक रोटियां ज़्यादा हैं. सीधा सा उत्तर यही है कि उस व्यक्ति से उस मज़दूर को, जिसको अपने परिवार के लिए 8 रोटियों की आवश्यकता है, रोटियां दिला देनी चाहिए. यह सही है, पर हो कैसे! यदि वह मजदूर चोरी या ताक़त से उस दूसरे व्यक्ति महंत की रोटियां लेता है तो वह क़ानूनन दंडित होता है, पुलिस पकड़ कर उसे जेलखाने भिजवा देती है. ऐसा क्यों होता है? सामाजिक व्यवस्था के अनुसार उसका अधिकार 2 ही रोटियों पर है और उस महंत का अधिकार 20-25 पर है. ऐसा क़ानून है और क़ानून की रक्षा करने के लिए सरकार की तऱफ से पुलिस तैनात है. इसलिए उसके लिए क़ानून बदलना ज़रूरी है. संसद क़ानून बदलती है और जो क़ानून बदलें, ऐसे व्यक्तियों को चुनकर जनता संसद में भेजती है. प्रजा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हीं व्यक्तियों का चुनाव करती है, जिनसे उसे अपने अनुकूल क़ानून बनवा सकने की आशा होती है. आपने कई बार अख़बारों में पढ़ा होगा कि अमुक महाराजा के कुमार ने या अमुक सेठ के लड़के ने न्यायालय में इसलिए शिकायत की कि एक लाख सालाना में किसी हालत में उसका काम नहीं चल सकता, उसे कम से कम दो लाख सालाना दिलवाया जाए, इत्यादि. लाखों ऐसे व्यक्ति भी देश में मौजूद हैं, जिन्हें सालाना 500 रुपये भी प्राप्त नहीं हो रहे हैं. ऐसी विषम परिस्थितियों को देख-सुनकर जनता आवाज़ उठाती है और संसद क़ानून बनाती है.
फलस्वरूप उस राजा के कुमार से या सेठ के लड़के से आयकर, संपत्ति कर और अन्य करों के रूप में कुछ धन ले लिया जाता है. वह धन दूसरों को मुफ्त विद्या, कम शुल्क में बीमारी का इलाज, मुआवज़े, शहरों और गांवों में पीने के लिए मुफ्त पानी इत्यादि व्यवस्थाओं के रूप में बांट दिया जाता है. इस तरह यह वितरण अनवरत होता रहता है, पर इसकी गति इतनी धीमी या शिथिल है कि अधिकांश व्यक्तियों को महसूस ही नहीं हो पाता कि उनको कुछ लाभ मिल भी रहे हैं क्या? जिनके द्वारा संचय किया जाता है, उनकी संख्या बहुत कम है और जिनके लिए वितरण होता है, उनकी संख्या बहुत अधिक है. इस कारण यह परिवर्तन नगण्य ही मान लिया जाता है, क्योंकि सब प्रकार के कर दे चुकने के बाद भी उस राजकुमार या सेठ के लड़के के पास ख़र्च करने के लिए सालाना 25 हज़ार तो बच ही जाते हैं, जबकि सब तरह की सहूलियतें मिलने के बावजूद उन साधारण व्यक्तियों को सालाना ख़र्च करने के लिए 1000 रुपये भी प्राप्त नहीं हो पाते. अतएव वर्तमान वितरण व्यवस्था से हर व्यक्ति असंतुष्ट है, बंटवारा सब चाहते हैं. सब चाहते हैं कि ज़्यादा उचित ढंग से बंटवारा हो. इतना भेदभाव नहीं होना चाहिए. पर असल में कितना- कितना बंटवारा कैसे हो, यह बताने में लोग या तो हिचकिचाते हैं या असमर्थ हैं.
कई व्यक्ति, जिन्होंने कभी इस प्रश्न को गहराई से सोचा ही नहीं है, कह देते हैं कि जिनके पास जितने रुपये हैं, उनको उतनी ही रोटियां या कपड़े ख़रीद कर ख़र्च करने का अधिकार होना चाहिए. पर वे भूल जाते हैं कि आख़िर रुपया-सोना-चांदी या जेवर तो खाने-पीने की चीजें हैं नहीं. रुपया जीवनोपयोगी चीजें ख़रीदने के काम आता है. तो फिर प्रश्न यह रहा जाता है कि रुपयों का बंटवारा किस प्रकार होना चाहिए? बंटवारा सब चाहते हैं और बंटवारा होना सुनिश्चित भी है. पर ऐसा कौन सा ढंग सबसे ज़्यादा उचित है, जिससे संतोषपूर्ण तरीक़े से संपत्ति का बंटवारा हो सके.
महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन् 12 अगस्, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

समाजवाद क्या है

समाजवाद का मूल सिद्धांत है देश की कमाई को नए ढंग से बांटना. आपने शायद लक्ष्य नहीं किया हो, पर यह सत्य है कि देश की आय प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण बंटती रहती है और उस आय का बंटवारा होता ही रहेगा. जब तक देश में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद रहेंगे, तब तक अहर्निश यह बंटवारा होता ही रहेगा. प्रश्न हमारे सामने यह नहीं है कि बंटवारा होना चाहिए या नहीं, बंटवारा तो होगा ही, पर सोचना यह है कि किसको किन शर्तों पर कितना मिले? पाश्चात्य विद्वान महर्षि पाल ने एक बार कहा था-जो काम नहीं करेगा, उसे खाने को नहीं मिलेगा. वे शायद अदूरदर्शी थे. वे भूल गए कि संसार में बच्चे भी तो हैं. बच्चे काम नहीं कर सकते और भूख सबसे ज़्यादा उन्हीं को सताती है. अगर उन्हें समय पर खाने को न मिले तो शायद विश्व में कोई भी जीवित नहीं बचेगा. इसलिए यह नियम कि जो काम करे वही खाना खाए, चल नहीं सकता.
कई व्यक्ति, जिन्होंने कभी इस प्रश्न को गहराई से सोचा ही नहीं है, कह देते हैं कि जिनके पास जितने रुपये हैं, उनको उतनी ही रोटियां या कपड़े ख़रीद कर ख़र्च करने का अधिकार होना चाहिए. पर वे भूल जाते हैं कि आख़िर रुपया-सोना-चांदी या जेवर तो खाने-पीने की चीजें हैं नहीं. रुपया जीवनोपयोगी चीजें ख़रीदने के काम आता है.
कई लोग समझते हैं कि जिस तरह वे बचत कर सकते हैं, उसी तरह विश्व के धन का संचय या संग्रह करके रखा जा सकता है. यह भारी भूल की बात है. बहुत सा धन जो हम सबको जीवित रखता है, सप्ताह से ज़्यादा टिक नहीं सकता, नष्ट हो जाता है. सोने का कंगन उम्र भर क़ायम रह सकता है, पर कंगन खाकर तो जीवित नहीं रह सकते. दाल-रोटी, शाक-सब्ज़ी, दूध-दही या किसी प्रकार के निरामिष या सामिष भोजन आप कितने ही प्रयास क्यों न करें, सप्ताह से ज़्यादा टिक ही नहीं सकते. एक सप्ताह इसलिए कि वर्तमान वैज्ञानिक उपकरणों से फ्रिज में, थरमस में ब़र्फ से आवृत्त रखकर कई उपायों से उसे ताज़ा रखा जा सकता है. नहीं तो दो-तीन दिन में ही सब प्रकार के भोजन नष्ट हो जाते हैं. इसके बाद जो बासी खाएंगे तो आपको हमको बीमारी होगी, पेट में ज़हर हो जाएगा और जीवन का खतरा भी पैदा हो जाएगा. कपड़े जो आप और हम पहनते हैं, वे भी ज़्यादा समय तक टिक नहीं सकते. अगर कामकाजी व्यक्ति हैं तो कपड़े बहुत जल्दी फट जाते हैं. मैले तो खैर पसीने गर्द इत्यादि से हर रोज़ होते ही हैं, धुलवाने और सा़फ-स़फाई का ख्याल रखना ही होता है. लिहाज़ा कपड़ों की भी यही हालत है. जूतों में चाहे आप रबर के सोल लगवा लीजिए. छह महीने में टूटने वाले होंगे तो बारह महीने चल जाएंगे, पर वे भी नष्ट होंगे ही. हर साल नई फसल पैदा होती है. पिछले साल जो फसल हुई थी, उस पर आप और हम जीवित नहीं रह सकते. आने वाले वर्ष की फसल अभी तैयार नहीं हुई है. अत: हम सबको इसी साल की पैदावार पर जीवित रहना है, इसी को बोना-काटना या लादना है, इसी का आटा गूंधकर रोटियां बनानी हैं. इसी साल या समय के कपड़े सिलवाने या धुलवाने हैं. इस समय के लिए चम़डे के जूते बनवाने हैं. अन्यथा भूख, ठंड या गर्मी से बचाव न होने की वजह से मर जाएंगे, जीवित नहीं रह सकेंगे.
जिसको बचत कहा जाता है, वह सही अर्थ में भविष्य के लिए किया जाने वाला सौदा मात्र है. उदाहरणस्वरूप मान लीजिए, मैंने आज 101 रोटियां बनाईं. मैं स्वयं तो स़िर्फ एक ही खा सकूंगा, बाक़ी 100 मैं बचाकर सुरक्षित रख नहीं सकता, क्योंकि उनका नष्ट होना अवश्यंभावी है. एक सप्ताह के बाद वे खाने लायक़ रहेंगी ही नहीं. इसलिए मैं स़िर्फ सौदा ही कर सकता हूं. उस व्यक्ति के साथ, जिसे 100 रोटियों की आवश्यकता है. अगर मैं अपनी 100 रोटियां किसी को दे दूं और बदले में मान लो वह मुझे पांच नई रोटियां हर वर्ष भविष्य में देता रहे तो यह सौदा हुआ. यह बचत नहीं हुई. दो पक्षों के बीच एक सौदा हुआ, एक समझौता हुआ. एक पक्ष जो भविष्य के लिए अपनी व्यवस्था निश्चित करना चाहता है और दूसरा पक्ष जो वर्तमान में ज़्यादा ख़र्च करना चाहता है. इन दो पक्षों में आपसी सौदा हुआ. नतीजा यह हुआ कि मैं तब तक कुछ नहीं बचा सकता, जब तक कि दूसरा उस व़क्त ख़र्च करने वाला मुझे न मिल जाए. इसलिए यह धारणा कि सारा देश बचत कर सकता है, असंभव है. सत्य यही है कि कुछ भाग्यशाली व्यक्ति, जिनके पास उनकी ज़रूरत से ज़्यादा है, अपने भविष्य का कुछ बंदोबस्त कर सकते हैं, पर वह तभी संभव है, जब ऐसे व्यक्ति उन्हें मिल जाएं, जिनकी खपत निज की संपत्ति से अधिक है. तात्पर्य निकला कि राम जो बचाए, उसे हरी को ख़र्च करना चाहिए, नहीं तो राम की बचत व्यर्थ जाएगी, नष्ट होगी.
सारे राष्ट्र को अपनी-अपनी रोटी बनानी है और जीवित रहना है. अगर राष्ट्र काम करना बंद कर दे, निष्क्रिय हो जाए और उसके निवासियों के पास अपनी-अपनी निज की संपत्ति में ज़मीन, जायदाद, मकान हों और लाखों रुपये बैंक में जमा हों तो भी 15 दिन में सारा का सारा राष्ट्र मृत्यु के मुख में चला जाएगा. आप किसी धनिक से मिलें, जो सिर धुनकर कहता है कि अमुक निर्धन या ग़रीब व्यक्ति ने बचाकर नहीं रखा और अफसोस करता हो या उपदेश देता हो तो आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि ऐसे व्यक्तियों को सद्बुद्धि दें. वे अज्ञान में हैं, नहीं जानते बचत हो नहीं सकती. राष्ट्र को निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए. उसकी अनर्गल बातों या उपदेशों को ग्रहण करके किसी निर्धन व्यक्ति को यह सब सुनाकर उसे व्यथित मत कीजिए.
इस तरह से यह दैनिक क्रम चलता ही रहता है. हर व्यक्ति को रोज रोटी बनानी पड़ती है. प्रश्न स़िर्फ यही है कि किसको कितनी रोटी मिलनी चाहिए. मान लीजिए, एक ग़रीब व्यक्ति दिन भर मेहनत-मज़दूरी, परिश्रम करता है, उसके 4-6 बच्चे हैं. उसे कुल मिलाकर 8 रोटियां रोजाना चाहिए और उसके पास हैं केवल दो ही रोटियां. इसके विपरीत एक दूसरे व्यक्ति के पास रोजाना 20-25 रोटियां फालतू हैं. वह अकेला महंत है, कामकाज भी करने की ज़रूरत नहीं. फिर भी उसके पास दैनिक रोटियां ज़्यादा हैं. सीधा सा उत्तर यही है कि उस व्यक्ति से उस मज़दूर को, जिसको अपने परिवार के लिए 8 रोटियों की आवश्यकता है, रोटियां दिला देनी चाहिए. यह सही है, पर हो कैसे! यदि वह मजदूर चोरी या ताक़त से उस दूसरे व्यक्ति महंत की रोटियां लेता है तो वह क़ानूनन दंडित होता है, पुलिस पकड़ कर उसे जेलखाने भिजवा देती है. ऐसा क्यों होता है? सामाजिक व्यवस्था के अनुसार उसका अधिकार 2 ही रोटियों पर है और उस महंत का अधिकार 20-25 पर है. ऐसा क़ानून है और क़ानून की रक्षा करने के लिए सरकार की तऱफ से पुलिस तैनात है. इसलिए उसके लिए क़ानून बदलना ज़रूरी है. संसद क़ानून बदलती है और जो क़ानून बदलें, ऐसे व्यक्तियों को चुनकर जनता संसद में भेजती है. प्रजा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हीं व्यक्तियों का चुनाव करती है, जिनसे उसे अपने अनुकूल क़ानून बनवा सकने की आशा होती है. आपने कई बार अख़बारों में पढ़ा होगा कि अमुक महाराजा के कुमार ने या अमुक सेठ के लड़के ने न्यायालय में इसलिए शिकायत की कि एक लाख सालाना में किसी हालत में उसका काम नहीं चल सकता, उसे कम से कम दो लाख सालाना दिलवाया जाए, इत्यादि. लाखों ऐसे व्यक्ति भी देश में मौजूद हैं, जिन्हें सालाना 500 रुपये भी प्राप्त नहीं हो रहे हैं. ऐसी विषम परिस्थितियों को देख-सुनकर जनता आवाज़ उठाती है और संसद क़ानून बनाती है.
फलस्वरूप उस राजा के कुमार से या सेठ के लड़के से आयकर, संपत्ति कर और अन्य करों के रूप में कुछ धन ले लिया जाता है. वह धन दूसरों को मुफ्त विद्या, कम शुल्क में बीमारी का इलाज, मुआवज़े, शहरों और गांवों में पीने के लिए मुफ्त पानी इत्यादि व्यवस्थाओं के रूप में बांट दिया जाता है. इस तरह यह वितरण अनवरत होता रहता है, पर इसकी गति इतनी धीमी या शिथिल है कि अधिकांश व्यक्तियों को महसूस ही नहीं हो पाता कि उनको कुछ लाभ मिल भी रहे हैं क्या? जिनके द्वारा संचय किया जाता है, उनकी संख्या बहुत कम है और जिनके लिए वितरण होता है, उनकी संख्या बहुत अधिक है. इस कारण यह परिवर्तन नगण्य ही मान लिया जाता है, क्योंकि सब प्रकार के कर दे चुकने के बाद भी उस राजकुमार या सेठ के लड़के के पास ख़र्च करने के लिए सालाना 25 हज़ार तो बच ही जाते हैं, जबकि सब तरह की सहूलियतें मिलने के बावजूद उन साधारण व्यक्तियों को सालाना ख़र्च करने के लिए 1000 रुपये भी प्राप्त नहीं हो पाते. अतएव वर्तमान वितरण व्यवस्था से हर व्यक्ति असंतुष्ट है, बंटवारा सब चाहते हैं. सब चाहते हैं कि ज़्यादा उचित ढंग से बंटवारा हो. इतना भेदभाव नहीं होना चाहिए. पर असल में कितना- कितना बंटवारा कैसे हो, यह बताने में लोग या तो हिचकिचाते हैं या असमर्थ हैं.
कई व्यक्ति, जिन्होंने कभी इस प्रश्न को गहराई से सोचा ही नहीं है, कह देते हैं कि जिनके पास जितने रुपये हैं, उनको उतनी ही रोटियां या कपड़े ख़रीद कर ख़र्च करने का अधिकार होना चाहिए. पर वे भूल जाते हैं कि आख़िर रुपया-सोना-चांदी या जेवर तो खाने-पीने की चीजें हैं नहीं. रुपया जीवनोपयोगी चीजें ख़रीदने के काम आता है. तो फिर प्रश्न यह रहा जाता है कि रुपयों का बंटवारा किस प्रकार होना चाहिए? बंटवारा सब चाहते हैं और बंटवारा होना सुनिश्चित भी है. पर ऐसा कौन सा ढंग सबसे ज़्यादा उचित है, जिससे संतोषपूर्ण तरीक़े से संपत्ति का बंटवारा हो सके.
महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्‍म 12 अगस्‍त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्‍थान में हुआ था. उद्योगपति, स्‍वप्‍नदृष्‍टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्‍यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.
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